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Sunday, April 11, 2010

पांच सौ तैतीस 533

1 comment:

  1. दुलाराम जी आपरो जुनून ग़ज़ब है ,
    अर संग्रह भी !
    पण इचरज री बात आ कै टाबरपणै रै शौक़ री अळेवण ओजूं ठावकी मेल राखी हो ! वा' सा ! लखदाद है थांनैं ।
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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